
महाराष्ट्र की राजनीति और समाज में पिछले कई महीनों से मराठा आरक्षण का मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ था। गांव-गांव में बैठकों से लेकर सड़कों पर बड़े प्रदर्शन तक, मराठा समुदाय ने अपनी आवाज बुलंद की। इस आंदोलन का चेहरा बने मनोज जरांगे पाटिल ने अपनी अनोखी शैली और दृढ़ता से इसे एक नई ऊंचाई दी। आखिरकार, लंबी भूख हड़ताल और सरकार से लगातार बातचीत के बाद, उन्होंने आंदोलन खत्म करने का ऐलान किया।
लेकिन सवाल यह है कि—क्या सरकार ने मराठा समाज की सभी मांगें मान ली हैं? और आंदोलन के खत्म होने के बाद आगे क्या होगा? आइए विस्तार से समझते हैं।
मराठा आरक्षण आंदोलन की पृष्ठभूमि
मराठा समुदाय लंबे समय से शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण की मांग कर रहा है। समुदाय का कहना है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े होने के बावजूद उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।
2018 में महाराष्ट्र सरकार ने मराठों को आरक्षण देने की कोशिश की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे 50% से ज्यादा की सीमा के कारण खारिज कर दिया। इसके बाद से ही मराठा समाज का संघर्ष और तेज हो गया।
मनोज जरांगे इसी संघर्ष की आवाज बने। उन्होंने बार-बार साफ कहा कि जब तक मराठा समुदाय को न्याय नहीं मिलेगा, आंदोलन जारी रहेगा।
मनोज जरांगे की भूख हड़ताल
मनोज जरांगे ने लगातार कई दिनों तक भूख हड़ताल की। इस दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने लगी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
हजारों समर्थक रोज उनके साथ खड़े रहते थे। सोशल मीडिया पर भी #MarathaReservation ट्रेंड करता रहा।
उनकी जिद और जनता का समर्थन देखकर आखिरकार सरकार को आगे आना पड़ा और बातचीत का रास्ता खोलना पड़ा।
सरकार और जरांगे के बीच बनी सहमति
आखिरकार, महाराष्ट्र सरकार और जरांगे के बीच समझौता हुआ। सरकार ने कुछ शर्तें मानीं, और कुछ मुद्दों पर समिति बनाकर जल्द हल निकालने का भरोसा दिया।
सरकार की ओर से मान्य शर्तें:
- मराठा समाज को आरक्षण देने के लिए कानूनी रास्ता तलाशा जाएगा।
- मराठा समुदाय के लोगों को शिक्षा और नौकरी में ईडब्ल्यूएस (EWS) कोटा का लाभ तुरंत मिलेगा।
- जिन मराठा युवाओं के पास खेती या जमीन से जुड़े दस्तावेज हैं, उन्हें ओबीसी कोटा के तहत Kunbi प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया तेज की जाएगी।
- आंदोलन के दौरान जिन युवाओं पर केस दर्ज हुए हैं, उन्हें वापस लेने पर विचार होगा।
- आगे आरक्षण लागू करने के लिए विधानसभा में विशेष विधेयक लाया जा सकता है।
जरांगे ने क्यों तोड़ी भूख हड़ताल?
मनोज जरांगे ने कहा—
“यह सिर्फ मेरी जीत नहीं, पूरे मराठा समाज की जीत है। सरकार ने लिखित में भरोसा दिया है और अब हमें अपनी एकता बनाए रखनी है।”
उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन खत्म जरूर हो गया है, लेकिन नज़र सरकार की हर कदम पर बनी रहेगी। अगर वादे पूरे नहीं हुए तो फिर से संघर्ष शुरू होगा।
क्या सरकार ने सभी शर्तें मानीं?
सीधे शब्दों में कहें तो—नहीं।
सरकार ने कई अहम मांगों को माना है, लेकिन ओबीसी कैटेगरी में पूरे मराठा समाज को शामिल करने पर अभी फैसला नहीं हुआ है। यह सबसे बड़ा मुद्दा है और इसी पर आंदोलन की जड़ टिकी हुई है।
सरकार ने एक उच्चस्तरीय समिति बनाने की बात कही है, जो इस पर जल्द रिपोर्ट देगी।
आगे की राह क्या है?
भले ही आंदोलन अभी थमा हो, लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि यह आधा जीत और आधा इंतजार है।
- अगर सरकार वादे पूरे करती है, तो मराठा समाज को बड़ा लाभ मिलेगा।
- अगर देरी हुई, तो आंदोलन दोबारा तेज हो सकता है।
- राजनीतिक पार्टियां भी इस मुद्दे को आने वाले चुनावों में भुनाने की कोशिश करेंगी।
मराठा समाज की भावनाएं
इस आंदोलन ने साफ कर दिया है कि मराठा समाज अब चुप बैठने वाला नहीं है।
- गांव से लेकर शहर तक लोग अपने नेता के साथ खड़े रहे।
- महिलाओं और युवाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
- यह आंदोलन सिर्फ आरक्षण का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया है।
लोगों की राय
अगर आप सोशल मीडिया पर नजर डालें तो लोग इस आंदोलन को “जनता की ताकत” कह रहे हैं।
- कोई कह रहा है—“जरांगे ने मराठा समाज को एक कर दिया।”
- तो कोई लिख रहा है—“अब सरकार को अपना वादा निभाना ही होगा, वरना आंदोलन और बड़ा होगा।”
निष्कर्ष
मराठा आरक्षण आंदोलन का यह अध्याय भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन किताब अभी बाकी है।
मनोज जरांगे की भूख हड़ताल ने साबित कर दिया कि शांतिपूर्ण तरीके से भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
सरकार ने कुछ मांगें मानी हैं, कुछ पर वादा किया है।
अब मराठा समाज की निगाहें सिर्फ एक चीज पर हैं—सरकार अपने वादों पर कितनी ईमानदारी से खड़ी रहती है।
यह आंदोलन आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाएगा कि हक और सम्मान के लिए एकजुट होकर आवाज उठानी पड़ती है।
